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Monday, November 1, 2010

किसी ने कुछ बनाया है

किसी ने  कुछ बनाया है,
किसी ने कुछ बनाया था.

कही मंदिर की परिचय, कही मस्जिद का साया है .
ना तब पूछा था हम से, ना अब पूछने आये है.
हमेशा फैसला कर के, हमें यु ही सुनाया है.

किसी ने  कुछ बनाया है,
किसी ने कुछ बनाया था.

हमें फुर्सत कहा, रोटी के गोलाई के चक्कर से.
ना जाने किसका मंदिर है, ना जाने किसकी मस्जिद है.
ना जाने कौन उलझाता है, सीधे सच्चे धागों को.
ना जाने किसकी साजिश है, ना जाने किसकी जिद है.
अजब सा सिलसिला है ये, ना जाने किस ने चलाया है.

किसी ने  कुछ बनाया है,
किसी ने कुछ बनाया था.

वो कहते है तुम्हारा है, ज़रा तुम एक नज़र डालो.
वो कहते है बढ़ो  मांगो, ज़रुरी है ना तुम टालो.
मगर अपनी ज़रूरत, तो है बिलकुल ही अलग.
ज़रा ठहरो ज़रा सोचो, हमें साचो में मत ढालो.
बताओ कौन ये शोला, मेरे आँगन में लाया है.

किसी ने  कुछ बनाया है,
किसी ने कुछ बनाया था.

अगर हिंदू में आंधी है, अगर तूफा मुसल्मा है.
तो आओ आंधी तूफा, यार बन के कुछ नया करे.
तो आओ एक नज़र डाले, अहम से खुच सवालो पर.
कई कोने अंधरे है, मशालो को दिया कर दे.
अब असली दर्द बोलेंगे, जो सिने में छुपाया है.

किसी ने  कुछ बनाया है,
किसी ने  कुछ बनाया था.

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